'वर्जिनिटी टेस्ट के लिए मजबूर करना महिलाओं के सम्मान के अधिकार का उल्लंघन', छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की बड़ी टिप्पणी
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता की अपनी पत्नी के वर्जिनिटी टेस्ट की मांग असंवैधानिक है, क्योंकि यह संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है, जो महिला के सम्मान के अधिकार की रक्षा करता है. पीठ ने कहा कि किसी भी महिला को वर्जिनिटी टेस्ट के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता. बता दें कि छत्तीसगढ़ में एक पति ने अपनी पत्नी के वर्जनिटी टेस्ट कराने की याचिका हाईकोर्ट में दायर की थी.

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कहा कि किसी महिला को वर्जिनिटी टेस्ट के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता, क्योंकि ऐसा करना भारतीय संविधान के अनुच्छे 31 का उल्लंघन है. अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि अनुच्छेद 21 व्यक्ति को सम्मान के अधिकार सहित जीवन और स्वतंत्रता की सुरक्षा के मौलिक अधिकार की गारंटी देता है. हाईकोर्ट ने कहा कि वर्जिनिटी टेस्ट की अनुमति देना मौलिक अधिकारों, प्राकृतिक न्याय के प्रमुख सिद्धांतों और महिला के सीक्रेट मोडेस्टी के खिलाफ होगा.
अदालत ने क्या कहा?
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के जज जस्टिस अरविंद कुमार वर्मा ने एक व्यक्ति द्वारा दायर आपराधिक याचिका पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की, जिसमें उसने अपनी पत्नी के वर्जिनिटी टेस्ट की मांग की थी, व्यक्ति ने अपनी पत्नी पर किसी और के साथ अवैध संबंध होने का आरोप लगाया गया था. उसने पारिवारिक अदालत के 15 अक्तूबर 2024 के आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उसकी अंतरिम अर्जी खारिज कर दी गई थी. इस बीच, पत्नी ने आरोप लगाया कि उसका पति नपुंसक है और उसने सहवास से इनकार कर दिया है.
हाईकोर्ट ने कहा कि अगर याचिकाकर्ता यह साबित करना चाहता है कि नपुंसकता के आरोप निराधार हैं, तो वह संबंधित मेडिकल टेस्ट करा सकता है या कोई अन्य सबूत पेश कर सकता है. उसे पत्नी का वर्जिनिटी टेस्ट कराने और अपने सबूतों में कमी को पूरा करने की अनुमति नहीं दी जा सकती. यह आदेश नौ जनवरी को सुनाया गया था.
मजबूर नहीं किया जा सकता
हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता की अपनी पत्नी के वर्जिनिटी टेस्ट की मांग असंवैधानिक है, क्योंकि यह संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है, जो महिला के सम्मान के अधिकार की रक्षा करता है. पीठ ने कहा कि किसी भी महिला को वर्जिनिटी टेस्ट के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता. यह अनुच्छेद 21 के तहत दिए गए मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है. जस्टिस वर्मा ने कहा कि यह ध्यान में रखना होगा कि अनुच्छेद 21 'मौलिक अधिकारों का हृदय' है.
जस्टिस वर्मा ने आगे कहा कि वर्जिनिटी टेस्ट महिलाओं के शालीनता और उचित सम्मान के मूल अधिकार का उल्लंघन है. अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार अपरिवर्तनीय है और इसके साथ किसी भी तरह से छेड़छाड़ नहीं की जा सकती. याचिकाकर्ता को पत्नी का वर्जिनिटी टेस्ट कराने और इस संबंध में अपने साक्ष्य में कमी को पूरा करने की अनुमति नहीं दी जा सकती.
निचली अदालत के आदेश में कोई गलती नहीं
हाईकोर्ट ने कहा कि जैसा भी हो, लेकिन किसी भी मामले में, प्रतिवादी को वर्जिनिटी टेस्ट की अनुमति देना उसके मौलिक अधिकारों, प्राकृतिक न्याय के प्रमुख सिद्धांतों और एक महिला की गुप्त विनम्रता के खिलाफ होगा. अपरिवर्तनीय मानव अधिकार से तात्पर्य उन अधिकारों से है जो निरपेक्ष हैं तथा युद्ध या आपातकाल के समय भी इनमें कोई कमी नहीं की जा सकती.
पीठ ने आगे कहा कि दोनों पक्षों द्वारा एक दूसरे के खिलाफ लगाए गए आरोप साक्ष्य का विषय हैं और साक्ष्य के बाद ही कोई निष्कर्ष निकाला जा सकता है. पीठ ने कहा कि हाईकोर्ट का मानना है कि आरोपित आदेश न तो अवैध है और न ही गलत है और निचली अदालत द्वारा कोई न्यायिक त्रुटि नहीं की गई है.
क्या है मामला?
इस जोड़े ने 30 अप्रैल, 2023 को हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार विवाह किया और कोरबा जिले में पति के परिवार के घर में रहने लगे. याचिकाकर्ता के वकील के अनुसार, पत्नी ने अपने परिवार को बताया कि उसका पति नपुंसक है और उसने उसके साथ रहने या वैवाहिक संबंध स्थापित करने से इनकार कर दिया. इसके बाद 2 जुलाई 2024 को उसने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 144 के तहत रायगढ़ जिले के पारिवारिक कोर्ट में अंतरिम आवेदन दायर किया, जिसमें अपने पति से 20,000 रुपये का भरण-पोषण भत्ता मांगा गया.
भरण-पोषण दावे के अंतरिम आवेदन के जवाब में याचिकाकर्ता ने अपनी पत्नी का वर्जिनिटी टेस्ट कराने की मांग की, जिसमें आरोप लगाया गया कि वह अपने देवर के साथ अवैध संबंध में थी. उसने दावा किया कि विवाह कभी संपन्न नहीं हुआ. 15 अक्टूबर 2024 को रायगढ़ की पारिवारिक अदालत ने पति की याचिका खारिज कर दी जिसके बाद उसने हाईकोर्ट में आपराधिक याचिका दायर की.