नेपाल में कैसे खत्म हुई राजशाही? शाही महल में किसने खेला था खूनी खेल? जानिए जनता के विद्रोह ने कैसे बदला इतिहास

नेपाल, जो कभी राजाओं और उनकी शाही परंपराओं के लिए जाना जाता था आज एक लोकतांत्रिक गणराज्य है. हालांकि, इस बदलाव का सफर उतार-चढ़ाव से भरा रहा. इस बदलाव की जड़ें 1 जून 2001 की उस काली रात से जुड़ी हैं, जब काठमांडू के नारायणहिती पैलेस में हुए नरसंहार में राजा बीरेंद्र और उनके परिवार के कई सदस्य मारे गए.

Deeksha Parmar
Edited By: Deeksha Parmar

हिमालय की गोद में बसा नेपाल कभी राजाओं और उनकी शाही परंपराओं के लिए पहचाना जाता था, लेकिन अब यह देश लोकतांत्रिक गणराज्य के रूप में अपनी राह तलाश रहा है. हालांकि, नेपाल का यह सफर आसान नहीं रहा. 240 साल पुरानी राजशाही का अंत, शाही परिवार का रहस्यमयी नरसंहार और लोकतंत्र की राह में आई चुनौतियां... इन सबने इस देश के इतिहास को किसी थ्रिलर से कम नहीं बनाया.

आज, जब नेपाल की सड़कों पर राजशाही की वापसी की मांग फिर से उठ रही है, तो यह समझना जरूरी है कि आखिर राजा का शासन कैसे खत्म हुआ, शाही परिवार के नरसंहार में किसकी साजिश थी और भारत ने इसमें क्या भूमिका निभाई. तो चलिए जानते हैं.

शाह वंश से जुड़ा है नेपाल का इतिहास

आपको बता दें कि नेपाल का इतिहास शाह वंश से जुड़ा है. 1768 में गोरखा के राजा पृथ्वी नारायण शाह ने छोटे-छोटे राज्यों को एकजुट कर आधुनिक नेपाल की नींव रखी. उन्होंने काठमांडू, पाटन और भदगांव के तीन मल्ल राज्यों पर विजय प्राप्त कर नेपाल का एकीकरण किया. शाह वंश का दावा था कि वे प्राचीन भारत के राजपूतों के वंशज हैं. लगभग ढाई सौ वर्षों तक नेपाल पर शाह वंश का शासन रहा.

नेपाल में राणा वंश का उदय

19वीं सदी में राणा वंश का उदय हुआ, जिसने शाह राजाओं को नाममात्र का शासक बना दिया. राणाओं ने ब्रिटिश हुकूमत के साथ दोस्ताना रिश्ते बनाए, लेकिन 1951 में हुए जनआंदोलन के बाद राजा त्रिभुवन ने राणा शासन को उखाड़ फेंका और शाह वंश की सत्ता फिर से बहाल हुई. 1990 में नेपाल में बहुदलीय लोकतंत्र की बहाली हुई, लेकिन राजशाही बनी रही. यह स्थिति 2001 तक बरकरार रही, जब नेपाल के इतिहास का सबसे भयावह कांड सामने आया.

शाही परिवार का नरसंहार

1 जून 2001 की रात काठमांडू के नारायणहिती पैलेस में साप्ताहिक शाही भोज के दौरान अचानक गोलियों की बौछार हुई. सैनिक वर्दी में क्राउन प्रिंस दीपेंद्र शाह आए और अपने ही परिवार पर गोलियां बरसा दीं. इस नरसंहार में राजा बीरेंद्र, रानी ऐश्वर्या, राजकुमार निरंजन, राजकुमारी श्रुति सहित परिवार के कई सदस्य मारे गए. इसके बाद दीपेंद्र ने खुद को भी गोली मार ली और तीन दिन बाद उनकी मौत हो गई.

पारिवारिक विवाद का नतीजा था नरसंहार

आधिकारिक जांच में बताया गया कि यह नरसंहार पारिवारिक विवाद का नतीजा था. दीपेंद्र, ग्वालियर के शाही परिवार की देवयानी राणा से शादी करना चाहते थे, लेकिन रानी ऐश्वर्या इस रिश्ते के खिलाफ थी. इस असहमति ने पूरे शाही परिवार को खत्म कर दिया. हालांकि, कई लोग इसे साजिश मानते हैं और इसमें भारत की खुफिया एजेंसी रॉ (RAW) का नाम तक जोड़ते हैं, लेकिन इसके कोई ठोस सबूत नहीं मिले.

नेपाल में राजशाही का अंत 

शाही नरसंहार के बाद ज्ञानेंद्र शाह नेपाल के राजा बने, लेकिन उनकी लोकप्रियता कभी राजा बीरेंद्र जैसी नहीं रही. इस दौरान नेपाल माओवादी विद्रोह से जूझ रहा था. 1996 से 2006 तक चला यह आंदोलन राजशाही के खिलाफ था और इसमें गरीबी, बेरोजगारी और असमानता के मुद्दे उठाए गए. 2005 में राजा ज्ञानेंद्र ने सत्ता पर पूरी तरह कब्जा कर लिया, लेकिन इससे जनता और राजनीतिक दलों में भारी असंतोष फैल गया.

लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित

इसके बाद 2006 में जनआंदोलन-II शुरू हुआ, जिसमें माओवादी और लोकतंत्र समर्थक दल एकजुट हो गए. 28 मई 2008 को नेपाल की संविधान सभा ने 560-4 के बहुमत से राजशाही को खत्म कर नेपाल को संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित कर दिया. ज्ञानेंद्र शाह को नारायणहिटी पैलेस छोड़ना पड़ा और वे एक साधारण नागरिक बन गए.

भारत की भूमिका

नेपाल और भारत का रिश्ता ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक रूप से गहराई से जुड़ा हुआ है. 1951 में जब राजा त्रिभुवन ने राणा शासन के खिलाफ दिल्ली में शरण ली थी, तब भारत ने उनका समर्थन किया. 2008 में नेपाल में राजशाही खत्म करने में भी भारत की भूमिका मानी जाती है. कहा जाता है कि भारत की खुफिया एजेंसी रॉ (RAW) ने माओवादी नेता पुष्पकमल दहाल 'प्रचंड' के साथ मिलकर नेपाल में लोकतंत्र की नींव मजबूत करने में मदद की, ताकि चीन के बढ़ते प्रभाव को रोका जा सके.

प्रचंड की भारत से 'दूरियां' और बदले समीकरण

पुष्पकमल दहाल 'प्रचंड' ने 1996 में माओवादी विद्रोह की अगुवाई की थी, जिसका मकसद नेपाल में गणतंत्र की स्थापना करना था. भारत ने पहले नेपाल की राजशाही को समर्थन दिया था, लेकिन बाद में लोकतंत्र समर्थकों का समर्थन किया. 2008 में जब प्रचंड नेपाल के प्रधानमंत्री बने, तो उन्होंने अपनी पहली विदेश यात्रा के लिए चीन को चुना, जबकि परंपरागत रूप से नेपाली प्रधानमंत्री भारत की यात्रा पहले करते थे. इसके बाद भारत-नेपाल संबंधों में तनाव बढ़ गया. प्रचंड ने भारतीय हस्तक्षेप के खिलाफ भी आवाज उठाई और नेपाल को पूरी तरह स्वतंत्र रखने की कोशिश की.

क्या नेपाल में फिर लौटेगी राजशाही?

1. मार्च 2025 तक नेपाल में राजनीतिक अस्थिरता बढ़ती जा रही है. भ्रष्टाचार, आर्थिक संकट और हिंदू राष्ट्र की पहचान के खत्म होने का डर जनता को सड़कों पर ले आया है. काठमांडू की गलियों में "राजा वापस आओ, देश बचाओ" के नारे गूंज रहे हैं.

2. राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी और कई हिंदू संगठन नेपाल को फिर से हिंदू राष्ट्र बनाने की मांग कर रहे हैं. उनका तर्क है कि नेपाल की 80% से अधिक आबादी हिंदू है, इसलिए इसे धर्मनिरपेक्ष बनाए रखने की जरूरत नहीं.

3. ज्ञानेंद्र शाह अब 77 साल के हैं और सार्वजनिक जीवन से दूर हैं, लेकिन जनता का एक हिस्सा मानता है कि उनके शासनकाल में स्थिरता थी, जो अब नहीं है. दूसरी ओर, लोकतांत्रिक नेता इसे लोकतंत्र विरोधी साजिश बता रहे हैं.

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29 March 2025, 01:09 PM IST

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