इसलिए भगवान कृष्ण कह रहे हैं कि केवल कर्म पर ध्यान दो, फल की प्राप्ति पर अगर गए कि आपका चेतन मस्तिष्क काम करना चालू कर देगा आपका अवचेतन मस्तिष्क सामने आ ही नहीं पाएगा और आप अपना 100 फीसदी दे ही नहीं पाओगे। यह हमारे दिमाग की कार्यप्रणाली है। भगवदगीता को इसलिए बहुत बड़ी मनोवैज्ञानिक किताब कहा गया है। गीता मनोवैज्ञानिक किताब है ये आपके मनस को समझती है कि किस तरह से आपको काम करना है। फल के बारे में बिल्कुल आपका अधिकार नहीं है और फल के बारे में आपको सोचना ही नहीं है। आपका विचार ही नहीं जाना चाहिए कि फल क्या होगा। कर्म करने से पहले आपने जो जीवन का लक्ष्य बनाया है वह लक्ष्य केवल आपको बना लेना है उसके बाद कर्म करते जाना है।

कर्म फल के हेतु मत बनो। जीवन में दो चीजें होती है एक होता है साधन और दूसरा साध्य। साधन होता है जो उपक्रम हम अपनाते हैं जो कार्य हम करते हैं और साध्य होता है जिसकी हम प्राप्ति करना चाहते हैं। जैसे पढ़ाई में साध्य है हमारा टॉप करना और पढ़ाई करना हमारा साधन है। हम टॉप करने के लिए पढ़ाई कर रहे हैं। दो चीजें होती हैं हमने साध्य बनाया टॉप करना और हम उसके लिए पढ़ाई करने लग गए। हमारा जीवन का उद्देश्य अगर हमने साध्य बनाया है कि मुझे टॉप करना है तो मैं अपनी पढ़ाई करता रहूं और भूल जाऊं कि मुझे टॉप करना है या नहीं करना है। अगर मैं टॉप करने के हेतु बना लूंगा अपने आपको, मुझे किसी भी हाल में टॉप करना ही है तो बड़ी समस्या है।

पहली समस्या तो यह है कि मैं अपने दिमाग को 100 पर्सेंट पढ़ाई पर नहीं लगा पाऊंगा क्योंकि मुख्य दिमाग हो जाएगा कि मुझे टॉप करना है। दूसरी बात अगर मुझे लगता है कि मैं अपना लक्ष्य पढ़ाई से पूरा नहीं कर सकता तो मैं किसी अनुचित प्रयास में लग जाऊंगा कि मैं पेपर आउट करवा लूं, किसी तरह से मैं टीचर से जुगाड़ लगा लूं, किसी तरह से मैं कुछ और कर लूं। इस तरह के सारे विचार आपके प्रयत्नों को निष्फल कर देंगे और आप जीवन में असफल हो जाओगे। आपको किसी भी हालत में सफलता का हेतु नहीं बनना है। ईश्वर ने आपको इस प्रकृति की सबसे श्रेष्ठ कृति मनुष्य बनाकर भेजा है और जीवन इस तरह जीना चाहिए कि आप खुद अपने आप में साध्य हो। दुनिया में किसी भी काम का आप साधन नहीं हो। आपने अगर अपने आप को किसी का साधन बना लिया या साधन मान लिया तो आपके अंदर का मनुष्य मर गया। आप वस्तु हो गए।

जर्मन दार्शनिक कान्ट कहता है कि इस तरह से कार्य करो कि तुम्हारे अंदर की मनुष्यता अपने आप में साध्य बनी रहे उसने एक साध्यों के राज्य का नियम बतलाया। हमें कार्य उसी तरह से करने चाहिए कि साध्य अल्टीमेटली हम हैं क्योंकि हमें प्रभु से मिलना है। ऐसा भी नहीं है कि आप कर्म ही न करो। ये हो सकता है कि व्यक्ति कहे कि जब मुझे कोई फल ही नहीं चाहिए तो मैं क्यों काम करूं। इससे अच्छा बैठा हूं, पड़ा हुआ हूं। अगर आप बैठे रहोगे, पड़े रहोगे तो काम न करने का निर्णय भी एक कर्म है। यह निर्णय लेना कि मैं कुछ नहीं करूंगा कोई निर्णय नहीं लूंगा यह भी एक निर्णय है। कोई व्यक्ति बिना कर्म किए रह ही नहीं सकता। कोई न कोई, कुछ न कुछ वह कर्म करेगा ही। हमने जो अपना कर्तव्य चुना है जो अपने जीवन का लक्ष्य चुना है उस लक्ष्य के लिए जो कर्म हैं उसे निरंतर रूप से करते रहें बिना फल की प्राप्ति के, बिना सोचे हुए।

अगर हम निरंतर कर्म करते रहेंगे तो वह निरंतर कर्म एक ऐसा अभ्यास एक ऐसी आदत डालेगा हमारे अंदर कि हमारे अंदर अवचेतन मस्तिष्क या मस्तिष्क के अंदर जो छिपी हुई शक्तियां हैं वो सक्रिय हो जाएंगी और वह फ्रंट में आ जाएगी और हम अपने सेल्फ को बैक में ले आएंगे। जब हमारा सेल्फ बैक में आ जाएगा और अवचेतन मस्तिष्क सामने आ जाएगा तो हम ऐसे अद्भुत कार्य कर जाएगे जिसके बारे में हमने खुद नहीं सोचा था। एक स्टूडेंट जब पढ़ाई करता है तो कुछ ऐसी चीजें याद रख लेता है, कुछ ऐसी पंक्तियां परीक्षा में लिख देता है जिसके बारे में वह खुद नहीं सोचा होता है। एक प्लेयर अपने खेल के दौरान कुछ ऐसे शॉट्स लगा देता है, फुटबॉलर है या गोल्फर है वो ऐसा खेल खेल देता है कि जिसके बारे में वो खुद नहीं सोचा था कि क्या मैं भी ऐसा कर सकता हूं तो ये वो क्षमताएं जिसके बारे में आपने भी कभी नहीं सोचा वह क्षमताएं निकल कर बाहर आती हैं।