भौतिकता और आध्यात्मिकता ये दोनों एक सिक्के के दो पहलू हैं। अगर कोई व्यक्ति भूखा है उसके पास खाने को कुछ नहीं है। बीमार है पर उसके पास इलाज का सामान नहीं है। किसी का बच्चा बीमार है। किसी के बच्चे की शिक्षा की व्यवस्था नहीं है। ऐसे व्यक्ति से हम उम्मीद नहीं कर सकते कि वो आध्यात्मिकता की बात करेगा। आध्यात्मिकता के बारे में सोचेगा। मूल्यों के बारे में सोचेगा। अंग्रेज जिस अवस्था में हमें छोड़कर गए थे बहुत बुनियादी चीजों की आवश्यकता थी लेकिन इस देश की जनता इतनी जुझारू है कि डेढ़ सौ सालों तक संस्थागत रूप से भारत का शोषण हुआ, इस देश का शोषण हुआ। यहां के समग्र आर्थिक संसाधन यूरोप ले जाए गए और महज 75 साल में हम विश्व की छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनकर उभर आए। इसका श्रेय यहां की जनता को है। जनता को इसलिए है कि जनता जिस तरह से काम करती है वो होते हैं उसके मूल्य, उसकी परंपराएं, उसकी विचारधारा। किस तरह वह काम करती है।

यहां का एक सामान्य व्यक्ति भी 10-12 घंटे मेहनत करने के लिए तैयार रहता है। आज विकसित देशों के द्वारा इस देश पर कई तरह के प्रतिबंध लगाए गए ताकि आर्थिक रूप से आगे न बढ़ पाए। बहुत सारी वैचारिक बाधाएं खड़ी कर दी गईं ताकि सोच न सकें। हमारी शिक्षा व्यवस्था में भी हम देखें तो लार्ड मैकाले ने जिस तरह से सोचा था कि भारतीय को एक मानसिक गुलाम बनाने की प्रक्रिया और जिस तरह से सिलेबस डिजाइन किए गए थे। उनमें भी जो बदलाव होने चाहिए थे, भारतीय संस्कृति की सभ्यता की जो जानकारी मिलनी चाहिए थी वो नहीं है हमारे पास। आज भी हम अपने बच्चों को अपनी गुलामी का इतिहास ज्यादा पढ़ाते हैं। हम बच्चों को ये पढ़ाते हैं कि कैसे बाहरी आक्रांताओं ने हमारे ऊपर आक्रमण किया और हमारे देश के ऊपर शासन किया। किस तरह से बाहर के देशों से आकर लोग यहां अपने उपनिवेश स्थापित किए। हमारी जमीन, हमारे श्रम का दोहन हुआ। जब हम विश्वगुरु थे वो इतिहास हम कम पढ़ा पाते हैं। 

इन सारी परिस्थियों से हमने इन 75 सालों में बहुत कुछ सीखा है, बहुत कुछ किया है लेकिन अभी आगे बहुत कुछ किए जाने की आवश्यकता है। आज हम देख रहे हैं कि हमारा राजनैतिक नेतृत्व भारत को विश्वगुरु बनाने का बात कर रहा है। भारत को दुनिया में सबसे ऊपर ले जाने की बात कर रहा है। ये हम तभी कर सकते हैं जब हम अपने मूल्यों पर चलें। भारत की जनता, भारत एक देश, भारत एक राष्ट्र के तौर पर ये सुनिश्चित करे कि जो भारतीय मूल्य है जो इस माटी के मूल्य हैं। हमारे पूर्वजों ने, ऋषियों ने, मुनियों ने, हमारे वैज्ञानिकों ने, हमारे आयुर्वेद शास्त्रियों ने जिन मूल्यों का सृजन किया। उन मूल्यों को हम लें और हम उन मूल्यों पर आगे बढ़ते रहें तो निश्चित ही हम विश्व को ज्ञान दे सकते हैं। विश्व के गुरु बन सकते हैं। विश्व को लीड कर सकते हैं। दुनिया की अगुवाई कर सकते हैं। लेकिन अगर हम जो यूरोपियन मूल्य हैं या जो मध्य एशिया के मूल्य हैं उन्हीं मूल्यों के पीछे चलते रहेंगे तो हम केवल एक नौकरी ढूंढ़ने वाले बनेंगे। हमारी शिक्षा का उद्देश्य रहेगा कि हमें 20 हजार की नौकरी मिल जाए हमें 50 हजार की नौकरी मिल जाए।

किसी भी सभ्यता को किसी भी संस्कृति को किसी भी धर्म को किसी भी देश को आगे बढ़ाने का काम शिक्षा करती है। शिक्षा का मतलब सिर्फ किताबें पढ़ लेना, कुछ चीजें रट लेना, कुछ गुणा-भाग कर लेना भर नहीं है। शिक्षा का तात्पर्य है हमारी सुषुप्त शक्तियों को जागृत करना। हमारी सुषुप्त मानसिक शक्तियों को जागृत करना। हमारे अंदर विजन बनाना। हम हैं कौन ये बताना। जो भारतीय मस्तिष्क है ये उतना उर्वर है ये हमने दिखा दिया है पिछले 20-30 सालों में कि भारत से गए हुए लोग आज पूरे विश्व में उन्नत पदों पर हैं। चाहे वह कोई भी क्षेत्र हो। टेक्नोलॉजी हो, विज्ञान हो, अंतरिक्ष विज्ञान हो, आईटी हो, मेडिकल क्षेत्र हो या फिर कंप्यूटर जगत ही हो। राजीनीतिक हों, कार्पोरेट हों किसी तरह के पद हों। हर तरह के पदों पर सफलतापूर्वक संचालन कर रहे हैं और आज विश्व में भारतीय मस्तिष्क का लोहा माना गया है। उसका कारण है कि जेनेटिक इवोल्यूशन में जब विश्व में कहीं भी लोग लिखना-पढ़ना नहीं जानते थे।