अगर हम उत्पति और विनाश मान लें तो वो भी जो है एक तरह से शरीर ही हो गया जिसकी उत्पति और जिसका विनाश हो गया। लेकिन अगर हम शरीर ही मान लें आत्मा को, तो मरने के बाद बचता क्या है। ये भी एक बड़ा प्रश्न आ जाता है। भगवान कृष्ण कहते हैं कि जो आत्मा है वो अविनाशी है वो कभी विनाश को प्राप्त नहीं होती उसके स्वरूप बदलते जाते हैं। जो परमात्मा है आप ये सारा संसार देख रहे हो ये उसी के ऊपर आभाषित होता है। वह आधार है। जैसे आप देखोगे कि रेगिस्तान में मृगतृष्णा दिखेगी उसका आधार रेगिस्तान है लाइट है। जिनके आधार पर वह दिखाई देता है। उस तरह इस संसार का आधार परमात्मा है जैसे दही का आधार दूध है दूध ही बदलकर दही हो जाता है इसी तरह परमात्मा ही बदलकर ये सारा संसार बन जाता है। 

आज वैज्ञानक प्रगति बहुत है। वैज्ञानिक प्रगति में वैज्ञानिकों ने खोजा, देखा कि ये पृथ्वी है, सूर्य है सौरमंडल है आकाशगंगाएं हैं ये सभी धीरे-धीरे एक समय के बाद ब्लैकहोल में बदल जाएंगे फिर सारे ब्लैकहोल एक ऐसी अवस्था में पहुंच जाएंगे जिसको आज का साइंस स्टेट ऑफ सिंगुलेटिरी कहता है जहां समय नहीं होगा, जहां स्पेस नहीं होगा और जहां ये प्रकृति के सारे नियम नहीं लागू होंगे ये एक अलग अवस्था होगी। उसी अवस्था के और परे की अवस्था की बात भगवान श्रीकृष्ण कह रहे हैं कि वो अविनाशी वो परमतत्व है और उससे सारा संसार है और कोई भी संसार में ऐसा नहीं है जो इसका विनाश कर सके। क्योंकि ये अव्यय है इसमें कभी व्यय नहीं होता इसमें कभी कोई चेंज या फिर कोई परिवर्तन नहीं होता।

इसलिए ये जो परमात्मा है ये अविनाशी है। इसलिए भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं कि जब आत्मा का विनाश ही नहीं होता तो फिर क्यों तुम डर रहे हो। न तो तुम्हारी आत्मा का विनाश होगा और न ही दूसरों की आत्मा का विनाश होगा जिनको कि तुम मारोगे या फिर जो तुम्हें मारेंगे। तो ये तुम्हारा अवश्यंभावी उत्तरदायित्व है सैनिक का उत्तरदायित्व है युद्ध करना। युद्ध करो, मृत्यु के भय से मत डरो क्योंकि मृत्यु इस शरीर की होगी तुम्हारी मृत्यु कभी नहीं होगी। इस बात को तुम जान लो और समझो।