दुख आए तो उसका भी आनंद उठाओ और ये समझो कि ये दुख कुछ समय के लिए आया है और ये भी जाने वाला है फिर सुख आ जाएगा। तो जीवन को जीने का यह ढंग है कि जिस तरह हम सर्दी और गर्मी, धूप और छांव इनमें जीते हैं उसी तरह से हम सुख और दुख में जीएं यही भगवान कृष्ण कहते हैं।

जिस व्यक्ति को सुख और दुख व्यथित नहीं करते, दुखी नहीं करते, सर्दी और गर्मी जिसको दुखी नहीं करते। जब व्यक्ति गर्मी से डरता है घर में बंद हो जाता है एसी चला लेता है उसी तरह ठंड से डरता है हीटर चलाकर रहता है तो जब बाहर निकलना उसे डरावना प्रतीत होता है उसे कष्ट होता है लेकिन जो व्यक्ति मेहनती है, मेहनत करके अपने परिश्रम से पसीना उत्पन्न करता है और जब हवा चलती है तो उस हवा से पसीने सूखने पर जो ठंडक उत्पन्न होती है उसका एक अलग सुख होता है। मेहनत से पसीना बहाने का एक अलग सुख होता है।

इसी तरह से जब हम अपने जीवन में कर्म किये जाते हैं और फल पीछे छोड़ देते हैं और उसके फलों की इच्छा नहीं करते तो एक अलग तरह की खुशी एक संघर्षजनित जो फल होता है, कर्म करने की जो खुशी होती है वो खुशी हमारे अंदर उत्पन्न होती है। तो ऐसा व्यक्ति सुख और दुखों से प्रभावित नहीं होता, दुखी नहीं होता। ऐसा व्यक्ति जो सुख और दुख में समान अवस्था में रहे और धीर हो धैर्य न खोए व्यक्ति। ऐसा व्यक्ति ही अमरता के लिए उपयुक्त है, ऐसा व्यक्ति ही भगवदप्राप्ति कर सकता है, भगवान को पाने के लिए आगे बढ़ सकता है। अगर हम सुख में बहुत ज्यादा खुश हो गए और उछलने लगे विभोर हो गए और दुख आया तो हम अवसाद मे चले गए टूट गए तो हमारा व्यक्तित्व बहुत निम्न स्तर का है। हम जल्दी ही टूट जाएंगे जल्दी ही बिखर जाएंगे।

आज हम किसी भी क्षेत्र के किसी सफल व्यक्ति का उदाहरण लें। किसी भी फील्ड का हो चाहे वो एक्टिंग फील्ड का हो चाहे वह स्पोर्ट्स फील्ड का हो चाहे वो साहित्य से संबंधित हो, विचारक हो, दार्शनिक हो, धार्मिक हो, अगर हम उसको उठाएं और उसके चरित्र का विश्लेषण करें तो हम देखेंगे कि वो जीवन में बहुत सारे उतार और चढ़ावों से गुजरा है और उन उतार और चढ़ावों में उसने एक सामजंस्य कायम कर रखा है। न वो खुशियों में पागल हो गया और न दुखों में टूट गया। ऐसी समता उसे उस मानसिक अवस्था तक लेकर जाती है कि वह चीजों को निष्पक्ष तरीके से देख सकता है। जब आप चीजों को निष्पक्ष तरीके से देख सकते हो तब आप बाकी के लोगों से एक ऊपर के स्तर पर आ जाते हो।