ऋग्वैदिक ऋषियों ने इस बात को सबसे पहले ये बताया कि एकम सत विप्रा बहुधा वदन्ति और औपनिषदिक ऋषियों ने तत्व साक्षात्कार करके उस परम तत्व को भाषा में निरुपित करने की चेष्टा की। वैसे तो परम तत्व को भाषा में व्यक्त करना ही असंभव है लेकिन फिर भी उपमाओं के द्वारा, तुलनाओं के द्वारा जो कुछ भी कहा जा सका। ऋषियों ने उसे बताया। उन्होंने एक रास्ता दिखाया कि वह एक रास्ता है जब व्यक्ति सुख और दुख दोनों से परे होकर परम आनंद की अवस्था में पहुंचता है। अगर आप सुख के पीछे दौड़ते हो तो दुख अवश्यंभावी है। जैसे अगर कोई व्यक्ति सिक्का लिए हुए है तो उस सिक्के में हेड और टेल दोनों होंगे। उसका नाम बदल सकता है कुछ भी हो सकता है लेकिन उसके दो पहलू अवश्य होंगे। इसी तरह हम जबतक सुखों के पीछे भागते हैं यह हमारी मानसिक स्थिति है जो है ये हमारा साधारण जीवन है। इसके दो पहलू हैं। एक पहलू इसके सुख का है और दूसरा पहलू दुख का है। हम जीवन को इसकी घटनाओं को दो भागों में बांटते हैं। सकारात्मक और नकारात्मक।

एक जो हमारे लिए हितकर हैं हमारे लिए इप्सित हैं जिसकी हमने इच्छा की है वो हमारे  लिए सुखकर होती हैं और इसके जो विपरीत होती हैं वो हमारे लिए दुखदायी होती हैं। ऋषियों ने एक ऐसी मानसिक स्थिति की संकल्पना की कि जब व्यक्ति न दुखी होता है और न सुखी होता है। व्यक्ति सुख के पीछे नहीं भागता, न सुख चाहता ही है। व्यक्ति अपने कर्तव्यों को करता जाता है, अपने कार्य को करता जाता है। अपना सबकुछ प्रभु को समर्पित कर देता है तब व्यक्ति की एक ऐसी मानसिक अवस्था आ जाती है जब वह सुख और दुख से परे हो जाता है। उसे भारतीय दर्शन में, धर्म में मोक्ष कहते हैं। बुद्ध ने उसे निर्वाण कहा।

निर्वाण का मतलब है कि जिसके आगे कोई रास्ता नहीं है जो परम तत्व है। ऐसा सुख है जिसमें दुख का लेश मात्र भी नहीं है। दुख की सीमा ही नहीं है वहां। वहां तक पहुंच जाए दुख। ऐसी गति नहीं है कि दुख वहां तक पहुंच जाए। दुख तो सुख का ही दूसरा भाग है। अगर आप सुख से परे हो गए तो दुख से अपने आप ही मुक्त हो गए। ये अवस्था यह बताती है कि हम वैज्ञानिक रूप से कितने उन्नत थे। कहां तक हम पहुंच चुके थे। यही उन्नति हमें मोक्ष के विचार तक ले गई। भारतीय दर्शन और भारतीय परंपरा, भारतीय धर्म अपने विचारों को जीने वाला धर्म है। ये जो सोचता है वही करता है। यहां के ऋषि जिस विचार को मानते थे उसी का पालन करते थे।

कणाद इतने अहिंसक थे कि जंगल में जो कण गिर जाते थे, जो पेड़-पौधों के कण गिर जाते थे। उनको चुन-चुन कर उनको उठा-उठा कर अपना जीवन यापन करते थे। उनको कणाद कहा गया। जिसने अहिंसा की बातें की वो परम अहिंसा के रास्ते पर चला। ऐसा नहीं है कि बातें वो अहिंसा की कर रहा है और जीवों की, प्राणियों की हिंसा कर रहा है। बिल्कुल भी नहीं। जो हिंसा करेगा वह हिंसा की बात भी करेगा। यह हमारी ऋषि परंपरा का प्रचलन रहा उनका कार्य रहा।

जीवन जीने का यही ढंग रहा कि व्यक्ति जैसा अंदर हो वैसा ही बाहर हो। व्यक्ति के जीवन में द्वैध न हो, व्यक्ति के मन में द्वैध न हो। व्यक्ति का जीवन सरल हो। इसी सरलता के रास्ते पर चलकर ऋषियों ने दिखाया कि किस तरह इस जीवन का उपयोग करके हम मोक्ष तक पहुंच सकते हैं। हम ऐसी आत्मा की स्थिति तक पहुंच सकते हैं। जो समस्त समग्र सांसारिक शक्तियों से बहुत उच्चतर अवस्था है और वह एक ऐसी अवस्था है जो परम आनंद की अवस्था है। इसीलिए मोक्ष को परम आनंद की अवस्था कहा गया है। ईश्वर को सत चित आनंद कहा गया है। ईश्वर अपने आप में आनंद है उसको प्राप्त कर लेने से जो आनंद मिलता है वो परम आनंद है।