ईश्वर संसार में कहीं बाहर नहीं है वहां जाकर उसे प्राप्त करना है। यह आत्मा ही ईश्वर है। ईश्वर का अंश होने के कारण ईश्वर है। ईश्वर होने के कारण ईश्वर है। जो कुछ भी इस संसार में वह ईश्वरीय है। वह ईश्वर का ही है वह ईश्वर ही है। जो कुछ भी संसार में है वो ईश्वर में ही अवस्थित है क्योंकि ईश्वर के अलावा किसी और का अस्तित्व नहीं। जो यह मानते रहे हैं कि शैतान है जो हमसे गलत काम करवाता है। ऐसे विचारों की न तो उपयोगिता है और न ही ये तार्किक प्रतीत होते हैं। अगर कोई शैतान है जो हमसे गलत काम करवाता है। अगर ईश्वर है जो उस शैतान को कंट्रोल नहीं कर पाता है तो वह काहे का ईश्वर। क्यों उसकी भक्ति करें क्यों उसकी पूजा करें।

अगर शैतान इतना शक्तिशाली है कि वो ईश्वर के रहते हुए भी हमसे गलत काम करवा लेता है तो क्यों हम शैतान ही पूजा करने लगें। अगर ईश्वर के रहते हुए भी शैतान हमें बहका देता है तो ईश्वर का ईश्वरत्व खतरे में पड़ जाता है। ईश्वर ही ईश्वर है इस संसार में शैतान का कहीं कोई अस्तित्व नहीं है, शैतान हमारी कल्पनाओं में है। इसके अलावा कहीं नहीं है। हम अपनी गलती को मानते नहीं। हम अपने आप को गलत नहीं मान सकते और अपने आप को गलत न मानने के काऱण हम अपनी गलती का बोझ दूसरे पर डालने के कारण हमने शैतान की संकल्पना कर रखी है। ऋषियों ने हमें वह रास्ता दिखाया कि किस तरह हम अपने अंदर के मल को निकालकर और अपनी चेतना को पवित्र करके शुद्ध चेतन स्वरूप होकर मोक्ष तक पहुंच सकते हैं और इस मोक्ष तक पहुंचना मानव जीवन का लक्ष्य है। जीवन में जो व्यक्ति जितना सरल है जिसकी चेतना जितनी शुद्ध है वह उतना ही प्रसन्न है। एक व्यक्ति को जिसकी चेतना दबी हुई है।

जिसकी अविद्य़ा का लेप बहुत ज्यादा है उसको सुखी रहने के लिए बाहर साधन ढूंढ़ने पड़ते हैं। किसी को खुश रहने के लिए या नार्मल रहने के लिए शराब का सहारा लेना पड़ता है तो किसी को सुखी या खुश रहने लिए ड्रग्स का सहारा लेना पड़ता है। चरस का अफीम का हेरोइन का। किसी को सुखी रहने के लिए सेक्स का सहारा लेना पड़ता है लेकिन जब आपकी अन्तर्रात्मा का मल निकलने लगता है, मल क्षीण होने लगता है। आत्मा का स्वयं प्रकाश जागृत होने लगता है तो आपको खुश रहने के लिए इन चीजों की आवश्यकता नहीं रहती। आप सामान्य जीवन को जीते ही खुश लगने लगते हो। आपको काम में ही मजा आने लगता है। आप खिलाड़ी हो तो आप खेलकर खुश रह लेते हो, पाठक हो तो पढ़कर खुश रह लेते हो। जब इससे भी ज्यादा आपका मन पवित्र हो जाता है। आपके आत्मा की कलुषता हट जाती है तब आपको खुश रहने के लिए ये बाह्य कारण भी नहीं चाहिए।

आप अकारण ही खुश रहते हो। उसके ऊपर भी अगर आपकी आत्मा का मल पूर्णत: निकल जाए तो आपका स्वरूप प्रकाशित हो उठता है और वह स्वरूप ऐसा है जो परम आनंद स्वरूप है। उस समय आपको न तो किसी वस्तु की जरूरत है न तो किसी कार्य की जरूरत है खुश रहने के लिए। आपका स्वभाव ही खुश रहना बन जाता है और दुख आपको छू भी नहीं सकता। यही मोक्ष संकल्पना है। मोक्ष दुखों से मुक्ति का नकारात्मक कॉन्सेप्ट नहीं है। यह परम आनंद स्वरूप होने का सकारात्मक कॉन्सेप्ट है। आनंद स्वरूप होना हमारा स्वभाव है। सुख और दुख में बढ़ जाना ये अज्ञान अविद्य़ा के कारण होता है। हमारे प्रवृत्तियों में ज्यादा उलझ जाने के कारण होता है।

अगर हमने योग पद्धति से या प्रभु की कृपा से अपने वास्तविक स्वरूप को प्राप्त कर लिया तो हमें अपनी खुशी के लिए बाकी संसार के बाहर किसी भी चीज की आवश्यकता नहीं होती। भगवान कृष्ण कहते हैं जो व्यक्ति आत्मरति है। अपने आप में अंदर से खुश है। उसकी खुशी को संसार से बाहर के किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं है। वही साधु है। वही सिद्ध है। यही मोक्ष विचार है और इसी दिशा में हमें प्रयत्न करना चाहिए। हम अपने कर्तव्यों को जिस तरह करेंगे अपने कार्यों को जिस तरह से करेंगे, जिस तरह से समायोजित करेंगे और इस दिशा में जाते जाएंगे हम देखेंगे कि हमारे जीवन से दुख दूर हो रहे हैं, खुशियां मिल रही हैं। हम अनायास ही खुश हैं। जो प्राप्त है हम उसी में इतने खुश हैं कि हमें बाकी संसार की चिंता ही नहीं है। खुशी का यही रास्ता है।