आर्थिक स्थिति हो सकता है किसी की अच्छी हो किसी की खराब हो लेकिन समाज के अंदर अगर चेतना है तो कम से कम इतने सक्षम हैं कि कोई व्यक्ति भूख से नहीं मरेगा, हम इतने सक्षम हैं कि कोई व्यक्ति ठंड में बिना कपड़ों के नहीं मरेगा। हम इतने सक्षम हैं कि हम गरीब व्यक्ति का इलाज कर सकें। हम इतने सक्षम हैं लेकिन इसके लिए सामाजिक चेतना की आवश्यकता है। जिस समाज में बच्चे अपने मां-बाप को ही घर से निकाल दे रहे हों उस समाज से हम क्या उम्मीद करें तो फिर जितने भी पैसे दे दो कोई भी पैसे पर्याप्त नहीं होंगे। क्योंकि मां-बाप ने अपने बच्चे को इसलिए इतना प्रेम दिया है कि बुढ़ापे में जब कोई उनका सहारा नहीं होगा तो ये बच्चे सहारा होंगे। मां-बाप को पैसे-रूपये से भावना की जरूरत है प्रेम की जरूरत है और वो प्रेम मिले ये समाज को सुनिश्चित करना है।

कानून की अपनी सीमाएं हैं कानून किसी को प्रेम नहीं दिला सकता। कानून पैसे दिलवा सकता है, रहने की व्यवस्था करवा सकता है लेकिन प्रेम नहीं दिला सकता। प्रेम दिलाना समाज का काम है समाज को वो भावनाएं दिलानी पड़ेगी। समाज को अपने मूल्यों का पुनर्भाषित करना पड़ेगा, धर्म को आगे आना पड़ेगा और लोगों को धर्म से जुड़ना पड़ेगा। जबतक आप धर्म से नहीं जुड़ोगे समाज के अंदर सामाजिक चेतना विकसित नहीं होगी तबतक ये समस्याएं बनी रहेंगी। बेरोजगारी की समस्याएं हैं बाकी की भी समस्याएं हैं। अर्थव्यवस्था विकसित होती है कुछ लोग बेरोजगार होते हैं कुछ को रोजगार मिलता है ये सतत प्रक्रिया है लेकिन सुखों को पैसों के साथ जोड़ लेने का जो विचार है वो विचार अपने आप में समस्याओं को उत्पन्न करने वाला है। पहली बात हमें पैसों को सुख से अलग करना चाहिए दूसरी बात धर्म से हमें जुड़ना चाहिए और सामाजिक चेतना जो है उसको मजबूत करना चाहिए वो विकसित होना चाहिए।

जो व्यक्ति अपना उतरदायित्व पूर्ण कर रहा है तो हम नहीं कर सकते कि वो धर्म के रास्ते से हट गया है। भगवान कृष्ण गीता में कहते हैं कि तुम अपना कर्तव्य करो और निष्काम भाव से अपना कर्तव्य कर रहे हो तो इससे बड़ी पूजा कुछ भी नहीं होगी। अगर व्यक्ति अपने कर्तव्य के प्रति उदासीन हो गया है नशे में पड़ गया है, गलत रास्ते में जा रहा है लोगों को परेशान कर रहा है, लोगों को दुख देने में सुख की अनुभूति कर रहा है तब उसे विचार करने की आवश्यकता है कि वो गलत रास्ते पर है वो लोगों को दुख दे रहा है वो अपने आप को दुख दे रहा है अपने आप का नाश कर रहा है तो ऐसी अवस्था में अगर वो भगवदगीता पर चल दे तो उसके जीवन की जितनी असफलताएं हैं वो खुद मिट जाएंगी। क्योंकि सारी भारतीय चिंतन परंपरा का जो निचोड़ है वो भगवदगीता में है।

जबतक किसी को भूख नहीं लगी है तबतक हम उसे खाना नहीं दे सकते, जबतक किसी को प्यास नहीं है हम पानी नहीं दे सकते लेकिन भूख और प्यास है तो वो खाना और पानी ढूंढ़ लेगा। इसी तरह से अगर व्यक्ति को समस्या है वो धर्म के रास्ते पर नहीं है तो नहीं चलेगा जब तक उसको उसकी जरूरत महसूस नहीं हो। हमारे पास एक विकल्प होना चाहिए और इसपर आप अपने दुखों की मुक्ति पा सकते हैं जैसे कि जबतक आपको दर्द नहीं होगा आप डॉक्टर के पास नहीं जाएंगे लेकिन समाज में डॉक्टर है जिसे समस्या हो डॉक्टर के पास जा सकता है। इसलिए हमारे ऋषियों ने जो चिंतन किया, भगवान श्रीकृष्ण के रूप में अवतरित हुए। उन्होंने उस सारे चिंतन को हमारे सामने बड़े सरल और समाहित रूप में रख दिया। तो जिस किसी को भी समस्या है वो भगवदगीता का पाठ कर सकता है, भगवदगीता को पढ़ सकता है समझ सकता है।