जो नेता होता है जो नेतृत्व करता है उसमें यही क्षमता होती है। वो उन चीजों को देख लेता है जो बाकी नहीं देख पाते। इसी कारण से वो नेता होता है। वो लीड करता है। जो नेता है वो आगे भविष्य देख पाता है। भविष्य वह तब देख पाएगा जब वो अपनी वासनाओं से ऊपर उठ जाएगा। मान लीजिए एक कैप्टन गहै क्रिकेट है और वो अपनी वासनाओं में ही डूबा हुआ है। उसे वही खिलाड़ी अच्छा लगेगा जो उसकी चाटूकारिता करता हो। वो उन्हीं को चुनेगा जो उसे अच्छे लगते हों। उसे वही अच्छे लगेंगे जो उसके आसपास रहते हों क्योंकि वो अपनी वासनाओं में डूबा हुआ है अपनी इच्छाओं में डूबा हुआ है।

उसके ऊपर न्यूट्रीलिटी नहीं है कि वो अच्छे खिलाड़ी को देख सके और उनके गुण और दोष का विचार करके बेस्ट 11 का चयन कर सके और उनके साथ खेल सके। फलस्वरूप वो हार जाएगा। वो मैदान में भी असफल होगा। अगर उसके किस बॉलर का ओवर पिट गया तो वो टेंशन में आ जाएगा, दुखी हो जाएगा। टेंशन में आने से और दुखी होने से उसके निर्णय सके फैसले प्रभावित होंगे। जब निर्णय करने की क्षमता प्रभावित हो जाएगी तो वो गलत निर्णय करेगा, गलत फैसले लेगा और और गलत होगा। इसी तरह हमारे जीवन में भी है। अगर हम सुखों और दुखों के ऊपर एक समता नहीं बनाते, इनसे ऊपर उठने का प्रयास नहीं करते तो हम नेता नहीं बन सकते। हम जीवन में आगे नहीं बढ़ सकते। हम धीरे-धीरे आगे बढ़ें। जब हम अपनी वासनाओं से ऊपर उठेंगे, जब हम अपनी भावनाओं से ऊपर उठेंगे, हम समाज से ऊपर उठेंगे तब हम आध्यात्म के रास्ते पर पहुंचेंगे।

भगवान कृष्ण का यही उपदेश है कि एक-एक सीढ़ियां आपको चलते जाना है और इन सीढ़ियों पर चलते हुए आप सबसे पहले अपने व्यक्तिगत जीवन में सफल होगे और सामाजिक जीवन में सफल होगे आप भावनात्मक जीवन में भी सफल होगे फिर आप आध्यात्म में भी सफल होगे और आध्यात्म में आगे बढ़ जाओगे तो भगवान कृष्ण यही बता रहे हैं कि जिस व्यक्ति को सफल होना है उसे सुख और दुख से डरना नहीं है क्योंकि जबतक जीवन है ये आएंगे। आपको इन्हें सहन करना है और इनसे ऊपर उठना है। सुख और दुख से अगर आप ऊपर उठ गए जितना आप उठ गए मान लो जीवन में आप उतना ही सफल हो। यही भगवदगीता का महात्म्य है यही प्रभु का आदेश और उपदेश है।