महाभारत के युद्ध के समय जब भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को ज्ञान का उपदेश दे रहे थे ज्ञान योग का कर्म योग का तब अर्जुन के मन में प्रश्न आया कि यह योग कहां से आया। यह ज्ञान कैसे उद्भुत हुआ। भगवान कृष्ण कह रहे हैं कि मैंने यह योग विद्या का उपदेश सूर्य देश विवस्वान को दिया और विवस्वान ने मनुष्यों के पिता मनु को उपदेश दिया और मनु ने इसका उपदेश इक्ष्वाकु को दिया। सूर्य को विवस्वान भी कहते हैं। हमारे यहां सृष्टि की परंपरा में ऐसा माना जाता है कि सृष्टि और प्रलय की बड़ी लंबी परंपरा चल रही है। सृष्टि और प्रलय के बीच का जो समय होता है उसको कल्प कहते हैं। जो वर्तमान कल्प चल रहा है उसमें सूर्य का नाम विवस्वान है।

भगवान ने सबसे पहले यह ज्ञान सूर्य को दिया। सूर्य ने यह ज्ञान मनु को दिया, मनु ने यह ज्ञान इक्ष्वाकु को दिया। अब प्रश्न उठता है कि सूर्य तो अचेतन है। सूर्य एक ग्रह है यह ज्ञान किस तरह से सूर्य को भगवान ने दिया। सूर्य किस तरह ज्ञान ले सकता है और सूर्य किस तरह ज्ञान दे सकता है। इस बात को समझ लेना बहुत जरूरी है कि भगवदगीता में जिस ज्ञान की बात की जा रही है वह ज्ञान सामान्य ज्ञान नहीं है। किसी भी चीज का जो सामान्य ज्ञान होता है उसमें दो अनिवार्य तत्व होते हैं एक ज्ञाता जो ज्ञान प्राप्त कर रहा है और दूसरा ज्ञेय जिसका ज्ञान प्राप्त किया जा रहा है। सपोच कीजिए कि मैं एक फुटबाल देख रहा हूं, फुटबाल का ज्ञान प्राप्त कर रहा हूं तो वो वस्तु हुई फुटबाल यानी वह हुई ज्ञेय यानी जिसका ज्ञान प्राप्त किया जा रहा है और दूसरा ज्ञाता जो ज्ञान प्राप्त कर रहा है।

ये दो तत्व होते हैं और इन दोनों का जब सम्मिलन होता है ज्ञाता और ज्ञेय का तो जो उत्पत्ति होती है उसे हम ज्ञान कहते हैं। जिस योग की बात की जा रही है यह किस तरह का ज्ञान है। यह एक अलग तरह का ज्ञान है। यह एक ऐसा ज्ञान है जो बाहर कहीं उत्पन्न नहीं होता और चूंकि उत्पन्न नहीं होता इसलिए इसका विनाश भी नहीं होता। इसी ज्ञान को हम कहते हैं सहज ज्ञान। यह ज्ञान अन्तर्रात्मा में पहले से ही विद्यमान होता है। अज्ञान या अविद्या के कारण इसका स्वरूप ढंक जाता है इसका स्वरूप प्रकाशित नहीं होता है। जब विद्या का पर्दा हट जाता है तब इसका स्वरूप प्रकाशित होता है। यह सहज ज्ञान है यह सभी प्राणियों में अलग अलग मात्रा में उपलब्ध होता है।

एक शेर को कौन सिखाता है कि उसे वेज नहीं खाना है, उसे सब्जियां नहीं खानी है उसे पत्तियां नहीं खानी है। उसे मांस खाना है ये कौन बतलाता है उसको। उसके सेल्स में उसकी अन्तर्रात्मा में यह ज्ञान पहले से मौजूद है। वह सूंघकर यह जान जाता है कि कौन सा पदार्थ उसके खाने लायक है और कौन सा पदार्थ उसके खाने लायक नहीं है। इसी तरह से गाय को कौन बतलाता है कि उसे वेज खाना है और नॉनवेज नहीं खाना है। वह सूंघकर ही जान जाती है कि वेज खाना है और वेज में भी कौन सी पत्तियां उसे खानी है कौन सी पत्तियां उसे नहीं खानी है। कबूतर को यह ज्ञान कैसे है कि पृथ्वी की मैगनेटिक पावर को पहचान लेता है। उसकी दूसरी शक्ति है जिस स्थान पर उसे छोड़ोगे वो घूमकर फिर उसी स्थान पर आ जाएगा।

कछुए के पास जो विलक्षण शक्ति है वो कहां से आई। वह उसका सहज ज्ञान है। इसी तरह मनुष्य इस प्रकृति का इस संसार का सबसे ज्यादा विकसित प्राणी है और सहज ज्ञान के रूप में अनेक अन्यान्न ज्ञान उसके अंदर छुपे हुए हैं। जितने भी बाह्य ज्ञान उसे दिये जाते हैं उनका स्वरूप होता है कि वो उसके आतंरिक ज्ञान को प्रकाशित कर दें। जैसे आप एक बच्चे को गिनती सिखाते हो उस गिनती का सम्प्रत्य बच्चे के अंदर पहले से छिपा हुआ है आप जितनी भी गिनती उसे सिखाते हो उस सारी शिक्षा का एक ही मात्र कार्य है कि बच्चे के अंदर गिनती के समप्रत्य को प्रगट कर दे। मान लीजिए कि आप एक बच्चे के साथ एक कुत्ते को भी बैठा दो। दोनों को गिनती सिखाओ, बच्चा गिनती सीख जाएगा, कुत्ता गिनती नहीं सीख पाएगा। क्योंकि कुत्ते के अंदर गिनती का वह समप्रत्य नहीं छिपा हुआ है कि आप उसको प्रकट कर सको। बच्चे के अंदर गिनती का वह समप्रत्य छिपा हुआ है जिसे वह प्रकट करता है।