कितने साधना के बाद बनते हैं अघोरी? कैसा होता है इनका जीवन, जानिए अघोर पंथ का इतिहास

Aghori history: उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में महाकुंभ 2025 की तैयारियां चल रही हैं, जिसमें लाखों श्रद्धालु और साधु भाग लेंगे. इनमें से एक ऐसा समुदाय है जो हमेशा से रहस्यमय और आकर्षण का केंद्र बना रहा है, वह हैं अघोरी. आज हम आपको अघोरी के बारे में बेहद दिलचस्प बात बताने जा रहे हैं. तो चलिए जानते हैं.

Deeksha Parmar
Edited By: Deeksha Parmar

Aghori history: इन दिनों उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में महाकुंभ की तैयारियां चल रही हैं, जहां दूर-दूर से साधु-संन्यासी आएंगे. इन साधुओं में एक ऐसा समुदाय भी होगा, जिसे देख लोगों के मन में रहस्य और रोमांच का भाव जाग उठता है. इन्हें अघोरी कहा जाता है। अघोरी भगवान शिव के अनुयायी होते हैं और इनकी साधना का तरीका बहुत अलग होता है. यह श्मशान घाटों पर साधना करते हैं और शिव तथा शव साधना में लगे रहते हैं.

अघोर पंथ का इतिहास बहुत पुराना है और इनका उद्देश्य आत्मज्ञान प्राप्त करना और जनकल्याण करना होता है. अघोरी बनने के लिए व्यक्ति को सालों तक कठिन साधना और तपस्या करनी पड़ती है. यह एक अत्यंत कठिन और चुनौतीपूर्ण प्रक्रिया होती है. अघोरी बनने के लिए विशेष रूप से श्मशान घाट, जंगल या एकांत स्थानों पर साधना की जाती है, जहां व्यक्ति खुद को शारीरिक, मानसिक और आत्मिक रूप से शुद्ध करता है. तो चलिए इनके बारे में विस्तार से जानते हैं.

अघोर पंथ का इतिहास

अघोर पंथ के रचयिता भगवान शिव माने जाते हैं. अघोर पंथ की उत्पत्ति भगवान शिव द्वारा हुई थी, और यह पंथ भगवान शिव के अनुयायी होते हैं. अघोरी संतों का मानना है कि भगवान शिव ने ही इस पंथ की नींव रखी थी. वहीं भगवान दत्तात्रेय को अघोर शास्त्र का गुरु माना जाता है. अघोरी साधना का उद्देश्य आत्मज्ञान प्राप्त करना और अपने जीवन को साधना के उच्चतम स्तर तक पहुंचाना होता है.

 कौन होते हैं अघोरी

अघोरी एक विशेष संप्रदाय से जुड़े होते हैं जो भगवान शिव के अनुयायी होते हैं. माना जाता है कि अघोर पंथ की उत्पत्ति भगवान शिव ने की थी. वे श्मशान घाट पर साधना करते हैं और तंत्र-मंत्र, शिव साधना, और शव साधना जैसी विधियों से जुड़ी साधनाएं करते हैं.

अघोरी बनने की प्रक्रिया

दीक्षा और गुरु का चयन- अघोरी बनने के लिए सबसे पहले एक व्यक्ति को अपने गुरु से दीक्षा लेनी होती है. गुरु के मार्गदर्शन में ही वह साधना करता है.

श्मशान साधना- अघोरी श्मशान घाटों पर साधना करते हैं, जहां वे मृत्यु, शव, और अन्य रहस्यमय तत्वों का सामना करते हैं. यह साधना उन्हें मानसिक रूप से मजबूती और तंत्र-मंत्र की शक्ति प्रदान करती है.

शिव साधना और शव साधना- अघोरी शिव साधना करते हैं और शव साधना के माध्यम से जीवन और मृत्यु के रहस्यों को समझने की कोशिश करते हैं. शव के साथ साधना करने का उद्देश्य आत्मा और शरीर के वास्तविक स्वरूप को जानना होता है.

साधना में कठिन तप- अघोरी अपनी साधना में कठोर तपस्या करते हैं, जैसे कि 24 घंटे बिना भोजन या पानी के ध्यान करना, अपनी भोग-विलास की इच्छाओं को छोड़ना और ध्यान के माध्यम से आत्मा के उच्चतम स्तर तक पहुंचना है.

बाबा कीनाराम की पूजा

अघोरी संप्रदाय में बाबा कीनाराम की पूजा का महत्व है. वे 1601 ईस्वी में चंदौली जिले में जन्मे थे और उन्होंने भारत के विभिन्न हिस्सों में भ्रमण कर साधना की थी. अघोरी दिखने में भले ही कठोर होते हैं, लेकिन उनका मुख्य उद्देश्य जनकल्याण होता है. वे अपनी तांत्रिक शक्तियों के माध्यम से लोगों की मदद करते हैं और उनके जीवन में शुभ फल लाने की कोशिश करते हैं.

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04 January 2025, 11:29 AM IST

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