2002 के गुजरात दंगों की पीड़ित बिलकिस बानो द्वारा 11 आरोपियों की रिहाई के खिलाफ दी गई ज़मानत याचिका सुप्रीम कोर्ट में ख़ारिज कर दी गई है। चूँकि न्यायधीश इच्छा मृत्यु से सम्बंधित मामले में सुनवाई कर रहे थे। बिलकिस बानो ने 2002 में अपने साथ हुए गैंग रपे के मामले में गुजरात सरकार द्वारा 11 आरोपियों की सजा माफ़ करने की चुनौती दी थी। जब ये हादसा हुआ तब बिलकिस बानो की उम्र केवल 21 साल थी और वह गर्भवती भी थीं, इसके अलावा मारे जाने वाले परिवार के सदस्यों में उनकी 3 साल की बेटी भी थी।

गुजरात सरकार ने इस मामले के आरोपियों को पिछले साल 15 अगस्त को रिहा कर दिया था। बिलकिस बनो केस में सुनवाई न्यायधीश अजय रस्तोगी और सी टी रविकुमार की एक पीठ ने करनी थी। सुनवाई की नई तारीख़ अब शीर्ष अदालत द्वारा रजिस्ट्री द्वारा अधिसूचित की जाएगी। बिलकिस बानो ने 30 नवंबर 2022 को शीर्ष अदालत में राज्य सरकार द्वारा 11 आरोपियों को सजा में छूट देने के लिए चुनौती देते हुए कहा था कि समय से पहले इनकी रिहाई ने समाज की आत्मा को झंझोड़कर रख दिया है। दोषियों की रिहाई को चुनौती देने वाली याचिका के अलावा बिलकिस बानो ने एक और याचिका दायर की थी जिसमें 13 मई 2022 के आदेश की समीक्षा की मांग की थी। हालाँकि उसकी समीक्षा याचिका को कोर्ट ने पिछले साल दिसंबर में ख़ारिज कर दिया था।

इस केस में सभी आरोपियों को गुजरात सरकार ने पिछले साल 15 अगस्त को रिहा कर दिया था। मुंबई की एक विशेष सीबीआई अदालत ने 21 जनवरी 2008 को बिलकिस बानो के सामूहिक बलात्कार और उसके परिवार के सात सदस्यों की हत्या के जुर्म में 11 आरोपियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। हालाँकि 15 साल से ज़्यादा जेल में सज़ा काटने के बाद उन्हें पिछले साल गोधरा जेल से बाहर कर दिया गया क्योंकि गुजरात सरकार ने क्षमा नीति के तहत उन 11 आरोपियों को रिहा करने की अनुमति दी।