जब मिर्ज़ा ग़ालिब की गज़ल सुन आग बबूला हो उठा शाही कवि
महान शायर
मिर्ज़ा ग़ालिब को उर्दू-फ़ारसी का सर्वकालिक महान शायर माना जाता है.
जन्म
इस महान शायर का जन्म 27 दिसंबर 1796 में उत्तर प्रदेश के आगरा शहर में हुआ था.
शायर
ग़ालिब को उस शायर के रूप में जाना जात है जो खड़े-खड़े ग़ज़लें बनाते थे और ऐसे पढ़ते थे कि महफिलों में भूचाल आ जाता था.
शाही कवि
एक समय की बात है कि ग़ालिब बाज़ार में बैठे जुआ खेल रहे थे तभी वही से शाही कवि ज़ौक का क़ाफिला निकला.
तंज
ग़ालिब ने तंज कसते हुए कहा, 'बना है शाह का मुसाहिब, फिरे इतराता.
आग बबूला
इस पर ज़ौक आग बबूला हो उठे पर उन्होंने अपनी पालकी से उतरकर ग़ालिब के मुंह लगना ठीक न समझा.
सलामत
उन्होंने बादशाह सलामत से उनकी शिकायत कर दी. बादशाह ने ग़ालिब को दरबार में पेश होने को कहा.
बादशाह
बादशाह ने ग़ालिब से पूछा कि क्या मियां ज़ौक की शिकायत जायज़ है ? ग़ालिब ने बड़ी चालाकी से कहा कि जो ज़ौक ने सुना वो उनकी नई ग़ज़ल का मक़्ता है
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