नेपाल का हालिया घटनाक्रम बड़ा दिलचस्प रहा।देश में सरकार तो बन गयी लेकिन राजनीतिक दलों के बीच अंदरूनी खींचतान खत्म नहीं हुई।पुष्प दहल कमल प्रचंड ने इतिहास में बड़े ही नायाब तरीके से नाम लिखवाया।मतलब सत्ता की मलाई किसी और ने तैयार की और खाने वाला कोई और निकला।चीन की मदद से मलाई तैयार की केपी ओली ने और प्रचंड उस मलाई को चट गये। कहने का अर्थ ये है कि भारत के खिलाफ ज़हर उगलने वाले पूर्व प्रधानमंत्री के पी शर्मा ओली के साथ भारी विश्वासघात हो गया।वह चाहकर भी प्रधानमंत्री नहीं बन सके।

पिछले 25 दिसंबर को नेपाल में चुनाव हुए जिसमें नेपाली कांग्रेस को सत्ता से बेदखल होना पड़ा।नेपाल में शेर बहादुर देउबा की चलती सरकार को गिराने में चीन ने इस साजिश को अंजाम दिया जिसमें वह सफल रहा।शेर बहादुर देउबा नेपाली कांग्रेस के बड़े नेता हैं जिनके पास संसद में सबसे ज्यादा सीटें हैं।वह नेपाल में चीन को खुला खेल नहीं खेलने दे रहे थे।उन्होंने नेपाल में चीन की कुछ परियोजनाओं को रोक दिया था,वह इसकी जगह भारत को तवज्जो दे रहे थे।जाहिर है कि नेपाली कांग्रेस के साथ भारत के बढ़िया रिश्ते हैं।

असल में अपनी परियोजनाओं पर रोक से चीन परेशान था और इसलिए राष्ट्रपति जिनपिंग ने नेपाल की दो कम्युनिस्ट पार्टियों को साथ लाकर सरकार गिरवा दी।पुष्प दहल प्रचंड नेपाली माओवादी कम्युनिस्ट पार्टी के लीडर हैं।चीन की ओर ज्यादा झुकाव रखने के बावजूद वह भारत से भी रिश्तों को संभालकर रखते हैं।प्रचंड नयी दिल्ली में जेएनयू के छात्र रहे हैं। दूसरे हैं के पी ओली को जो पूर्व पीएम हैं और भारत के खिलाफ जहर उगलते हैं।वह उत्तराखंड के कुछ पहाड़ी इलाकों को भी अपना बताते हैं।उनके कार्यकाल में भारत और नेपाल के संबंध बेहद खराब हो गये थे।के पी शर्मा ओली की पार्टी का नाम UML है।

चुनाव नतीजे आने के बाद हुआ यह कि प्रचंड के पास 30 सीटें थी और केपी ओली के पास 80 सीटें।चुनाव से पहले ओली ने प्रचंड का पूरी तरह साथ दिया,लेकिन नतीजे आते ही केपी ओली को लगा कि सीटें उनके पास ज्यादा हैं लिहाजा वह क्यों नहीं प्रधानमंत्री बन सकते।प्रचंड को जब ओली की नीयत का पता लगा तो उन्होंने नेपाली कांग्रेस से समर्थन मांग लिया और हैरत तब हुई जब एक विपक्षी पार्टी ने प्रचंड को प्रचंड समर्थन देकर नेपाल की सत्ता के शिखर पर बैठा दिया।नेपाली कांग्रेस के पास संसद में 160 सीटें हैं।वह नेपाल की सबसे बड़ी पार्टी है।

ऐसा पहली बार हुआ और यह इतिहास में दर्ज होने लायक घटना है।इसके बाद केपी ओली के पास हाथ मलने के सिवाय कोई चारा नहीं बचा।उन्हें विश्वासघात की सजा मिल गयी।भारत के लिहाज से देखा जाए तो यह बहुत अच्छा हुआ।पूरे मामले में भारत काफी सक्रिय था।प्रचंड का प्रधानमंत्री बनना भारत की जीत माना जा सकता है। ओली को इस बार चीन का साथ नहीं मिला क्योंकि वह अपने पूर्व कार्यकाल में काठमांडू स्थित महिला चीनी राजदूत के साथ अपने अंतरंग संबंधों को लेकर काफी बदनाम हो चुके थे।वैसे हाल ही में प्रचंड ने भी सत्ता संभालने के बाद भारत को लेकर कुछ विवादित बयान दिए हैं लेकिन वह के पी ओली की तरह गिरे हुए नेता नहीं हैं।नेपाल के साथ भारत का रोटी-बेटी का रिश्ता है।अब वक्त बताएगा कि नेपाल और भारत के रिश्तों का ऊंट किस करवट बैठता है।

इसे भी पढ़े.................

भारत विरोधी केपी ओली का पीएम बनने का सपना चकनाचूर, संसद में सबसे बड़ी पार्टी बनी रास्ते का कांटा